15 January 2018

गूगल के डूडल में डॉ. हरगोविंद खुराना

गूगल के डूडल में डॉ. हरगोविंद खुराना
हमारे डीएनए के आवश्यक कार्य और प्रथम सिंथेटिक जीन के निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले भारतीय-अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. हरगोविंद खुराना को गूगल ने डूडल बनाकर सम्मान दिया है
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,डॉ. हरगोविंद खुराना को उनके शोध और कार्यों के लिए अनेकों पुरस्कार और सम्मान दिए गए। इन सब में नोबेल पुरस्कार सर्वोपरि है।
सन 1968 में चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला
सन 1958 में उन्हें कनाडा का मर्क मैडल प्रदान किया गया
सन 1960 में कैनेडियन पब्लिक सर्विस ने उन्हें स्‍वर्ण पदक दिया
सन 1967 में डैनी हैनमैन पुरस्‍कार मिला
सन 1968 में लॉस्‍कर फेडरेशन पुरस्‍कार और लूसिया ग्रास हारी विट्ज पुरस्‍कार से सम्मानित किये गए सन 1969 में भारत सरकार ने डॉ. खुराना को पद्म भूषण से अलंकृत किया
पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ ने डी.एस-सी. की मानद उपाधि दी
डॉ. हरगोविंद जीवकोशिकाओं के नाभिकों की रासायनिक संरचना के बारे में अध्ययन कर रहे थे। नाभिकों के नाभिकीय अम्लों के संबंध में खोज काफी लंबे समय से चल रही है। डॉ. खुराना के अध्ययन का विषय न्यूक्लिऔटिड नामक उपसमुच्चयों की अत्यंत जटिल, मूल, रासायनिक संरचनाएं थीं। डॉ. खुराना इन समुच्चयों का योग करके महत्वपूर्ण दो वर्गों के न्यूक्लिप्रोटिड इन्जाइम नामक यौगिकों को बनाने में सफल हुए थे। डॉ. हरगोविंद खुराना ने साल 1970 में आनुवंशिकी के क्षेत्र में एक और योगदान दिया, जब वह और उनका अनुसंधान दल एक खमीर जीन की पहली कृत्रिम प्रतिलिपि संश्लेषित करने में सफल रहे। 09 नवंबर 2011 को इस महान वैज्ञानिक ने अमेरिका के मैसचूसट्स में अंतिम सांस ली। उनके पीछे परिवार में पुत्री जूलिया और पुत्र डेव हैं।
,,,,,,,,,,हरगोविंद खुराना का जन्म अविभाजित भारत के रायपुर (जिला मुल्तान, पंजाब) नामक स्थान पर 9 जनवरी 1922 में हुआ था। उनके पिता एक पटवारी थे। अपने माता-पिता के चार पुत्रों में हरगोविंद सबसे छोटे थे। गरीबी के बावजूद हरगोविंद के पिता ने अपने बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दिया जिसके कारण खुराना ने अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगा दिया। वह जब मात्र 12 साल के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया और ऐसी परिस्थिति में उनके बड़े भाई नंदलाल ने उनकी पढ़ाई-लिखाई का जिम्मा संभाला। उनकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानिय स्कूल में ही हुई।
उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से सन् 1943 में बी.एस-सी. (आनर्स) तथा सन् 1945 में एम.एस-सी. (ऑनर्स) की डिग्री प्राप्त की। पंजाब विश्वविद्यालय में महान सिंह उनके निरीक्षक थे। इसके पश्चात भारत सरकार की छात्रवृत्ति पाकर उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड चले गए। इंग्लैंड में उन्होंने लिवरपूल विश्वविद्यालय में प्रफेसर रॉजर जे.एस. बियर के देख-रेख में अनुसंधान किया और डाक्टरेट की उपाधि अर्जित की। इसके उपरांत उन्हें एक बार फिर भारत सरकार से शोधवृत्ति मिलीं जिसके बाद वे जूरिख (स्विट्सरलैंड) के फेडरल इंस्टिटयूट ऑफ टेक्नॉलजी में प्रफेसर वी. प्रेलॉग के साथ शोध कार्य में लगे।
,,,,,,,,,,,,,,,,1952 में उन्हें वैंकोवर (कैनाडा) की कोलम्बिया विश्‍वविद्यालय से बुलावा आया जिसके बाद वह वहां चले गए और जैव रसायन विभाग के अध्‍यक्ष बना दिए गए। इस संस्थान में रहकर उन्‍होंने आनुवांशिकी के क्षेत्र में शोध कार्य प्रारंभ किया और धीरे-धीरे उनके शोधपत्र अंतरराष्‍ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं और शोध जर्नलों में प्रकाशित होने लगे। इसके फलस्वरूप वे काफी चर्चित हो गए और उन्‍हें अनेक सम्मान और पुरस्‍कार भी प्राप्‍त हुए।
सन 1960 में उन्हें ‘प्रफेसर इंस्टीट्युट ऑफ पब्लिक सर्विस’ कनाडा में स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया और उन्हें ‘मर्क एवार्ड’ से भी सम्मानित किया गया। इसके पश्चात सन् 1960 में डॉ. खुराना अमेरिका के विस्कान्सिन विश्वविद्यालय के इंस्टिट्यूट ऑफ एन्ज़ाइम रिसर्च में प्रफेसर पद पर नियुक्त हुए। सन 1966 में उन्होंने अमेरिकी नागरिकता ग्रहण कर ली।
सन 1970 में डॉ. खुराना मैसचुसट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी (एम.आई.टी.) में रसायन और जीव विज्ञान के अल्फ्रेड स्लोअन प्रोफेसर नियुक्त हुए। तब से लेकर सन 2007 वे इस संस्थान से जुड़े रहे और बहुत ख्याति अर्जित की।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,डॉ. खुराना ने जीन इंजिनियरिंग (बायॉ टेक्नॉलजी) विषय की बुनियाद रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जेनेटिक कोड की भाषा समझने और उसकी प्रोटीन संश्लेषण में भूमिका प्रतिपादित करने के लिए सन 1968 में डॉ. खुराना को चिकित्सा विज्ञान का नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया। डॉ. हरगोविंद खुराना नोबेल पुरस्कार पाने वाले भारतीय मूल के तीसरे व्यक्ति थे। यह पुरस्कार उन्हें दो और अमेरिकी वैज्ञानिकों डॉ. राबर्ट होले और डॉ. मार्शल निरेनबर्ग के साथ सम्मिलित रूप से प्रदान किया गया था। इन तीनों ने डी.एन.ए. अणु की संरचना को स्पष्ट किया था और यह भी बताया था कि डी.एन.ए. प्रोटीन्स का संश्लेषण किस प्रकार करता है।
नोबेल पुरस्कार के बाद अमेरिका ने उन्हें ‘नैशनल अकेडमी ऑफ साइंस’ की सदस्यता प्रदान की (यह सम्मान केवल विशिष्ट अमेरिका वैज्ञानिकों को ही दिया जाता है)।

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